रेडियोधर्मी प्रदूषण पर सरल निबंध

रेडियोधर्मी प्रदूषण :- 

रेडियोधर्मी प्रदूषण में वातावरण में विभिन्न प्रकार के कण तथा आण्विक परीक्षणों आदि से वातावरण की रेडियोधर्मिता बढ़ जाती है । जल , वायु और मिट्टी का इन कणों के द्वारा प्रदूषण विभिन्न प्रकार के भयानक रोग उत्पन्न कर सकता है । ऐसे रोग प्रायः आनुवंशिक होते हैं । रेडियोधर्मी पदार्थ बच्चों के लिए अधिक भयानक तथा हानिकारक हाते हैं ।

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प्रभाव :-

  • यह वर्तमान पीढ़ी के साथ - साथ आने वाली नयी पीढ़ी के लिए भी हानिकारक है । 
  • विस्फोट के स्थान से दूर - दूर तक प्रदूषण फैल जाता है । 
  • भोज्य पदार्थों के माध्यम से व्यक्ति व पशुओं के शरीर में पहुँचकर विभिन्न प्रकार के रोग पैदा करता है । 
  • बच्चों के लिए ये अधिक भयानक और हानिकारक होते हैं । 

रेडियोधर्मी प्रदूषण से बचाव :-  

  • परमाणु परीक्षण पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगाना चाहिए । 
  • परमाणु रियक्टरों को आबादी तथा आबादी के उपयोग की वस्तुओं से दूर लगाया जाना चाहिए । इनमें ' दूरस्थ नियंत्रण यन्त्र लगे होने चाहिए । 
  • कर्मचारियों को विकिरण के प्रभाव की सम्भावनाओं से पूर्णतया अवगत कराना चाहिए । उनका समय - समय पर परीक्षण होना चाहिए । 

पर्यावरण ह्रास :- 

मानव ने अपने विकास के लिए प्राकृतिक पारिस्थितिक तन्त्र को परिवतर्तित किया है । उसने वनों , वन्य - जीवों , खनिजों , कृषि भूमि , मत्स्य आदि का अत्यधिक शोषण किया तथा प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग अत्यंत तीव्र गति से बिना किसी नियोजन के किया है । मानव जंगलों को अन्धाधुन्ध साफ करके , मिट्टियों का अवैज्ञानिक प्रयोग कर और उद्योगधन्धों के द्वारा जल , वायु , ध्वनि प्रदूषण आदि में वृद्धि करके पारिस्थितिक तन्त्र को हानि पहुँचाता आ रहा है ।    
           इस प्रकार अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों में वृद्धि करके मानव ने पर्यावरण को प्रदूषित किया है और अपने अस्तित्व को संकट में डाल दिया है । पर्यावरण में ह्यस हमें निम्नलिखित रूपों में दिखाई देता है : 

( 1 ) प्रदूषण की समस्या : - 

प्रदूषण एक ऐसी समस्या है जिससे मानव सहित जैव जगत की कठिनाइयाँ बढ़ती जा रही है । पर्यावरण के तत्वों वायु , जल , भूमि आदि में गुणात्मक यस होने के कारण प्रकृति और जीवों का आपसी संबंध बिगड़ता जा रहा है । हवा , जल , धरातल अपनी गुणवत्ता खोते जा रहे हैं । प्रदूषण के कारण ही मौसम का स्वभाव बदल रहा है तथा मानव विभिन्न प्रकार की बीमारियों के चंगुल में फँसता जा रहा है । 

( 2 ) वानस्पतिक आवरण का ह्यस :-

मानव ओर वन का अति प्राचीन काल से ही गहरा संबंध है । आदिकाल में मानव पूर्णतः वनों पर आश्रित था । मानव सभ्यता विकसित होने के साथ ही साथ मानव ने अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति हेतु वन - सम्पदा का लकड़ी प्राप्त करने के लिए . कृषि भूमि के विस्तार के लिए , कच्चे माल की पूर्ति के लिए , पशुचारण के विस्तार के लिए तथा अन्य अनेक कार्यों के लिए अनियोजित तरीके से शोषण किया है । वनों को काटे जाने के कारण पर्यावरण प्रदूषित हुआ है जिससे भू - अपरदन , अनावृष्टि , बाढ़ आदि समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं तथा वन्य जीवों के प्राकृतिक आवासों में बाधा आने से उनके जीवन को संकट उत्पन्न हुआ है । 

( 3 ) जनसंख्या वृद्धि का कुप्रभाव :-

जनसंख्या यद्यपि महत्वपूर्ण ससाधन है , परन्तु प्राकृतिक संसाधनों की तुलना में तीव्र वृद्धि पर्यावरण को क्षतिग्रस्त करती है । जनसंख्या की तीव्र वृद्धि से खाद्यान्न , आवास , वस्त्र , वायु प्रदूषण जैसी अनेक गम्भीर समस्याएँ उत्पन्न हो गई है । चारागाह व वन प्रदेशों के रस तथा अन्य जीवों की संख्या में कमी के कारण पर्यावरण असन्तुलन की गम्भीर समस्या उत्पन्न हो गई है । 

पर्यावरण झस को नियन्त्रित करने के उपाय :-

( 1 ) जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण :- पर्यावरण में असन्तुलन वास्तव में तीव्र जनसंख्या की परिणति है । इसलिए जनसंख्या पर नियंत्रण करके इस भयावह स्थिति को रोका जा सकता है । 

( 2 ) वृक्षारोपण एवं वन्य - जीव संरक्षण : - प्रदूषण से बचने के लिए वनों के क्षेत्रफल में वृद्धि करना बहुत आवश्यक है । भारत में सुन्दरलाल बहुगुणा का ' चिपको आन्दोलन ' इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है पारिस्थितक तंत्र एवं पर्यावरण को सन्तुलित बनाये रखने के लिए वन्य - जीवों का संरक्षण एवं उनका संवधर्न बहुत आवश्यक है । उदाहरण के लिए यदि सॉप समाप्त हो जायें तो चूहों की संख्या में वृद्धि हो जायेगी जो फसलों एवं मिट्टी को नष्ट करके प्राकृतिक पर्यावरण को हानि पहुँचायेंगे ।

( 3 ) मत्स्याखेट पर नियंत्रण : - जल क्षेत्रों में मछलियों के पकड़ने उनकी संख्या में निरंतर कमी होती जा रही है । विकसित तकनीक का प्रयोग कर मत्स्य संसाधनों के उपभोग से नियमित मछलियाँ प्राप्त की जा सकती है ऐसे क्षेत्रों में प्रदूषण को रोका जाना अति आवश्यक है अन्यथा मछलियाँ आँक्सीजन की कमी से नष्ट हो सकती है । 

( 4 ) रासायनिक पदार्थों के फैलाव पर रोक :-  मानव अनेक विषैले एवं रासायनिक पदार्थों का उपयोग कृषि क्षेत्र में भारी मात्रा में करने लगा है । इससे भू - क्षरण , वायु प्रदूषण आदि की समस्याएँ पैदा हो गई है । रसायन फैलाकर कृत्रिम वर्षा कराना अब सामान्य बात हो गई है । वायुमण्डल में ओजोन की परत में छेद होने की सम्भावना से समस्त विश्व व्याकुल है । इसलिए रासायनिक पदार्थों के उपयोग व प्रसार पर प्रभावी रोक लगाना अत्यंत आवश्यक है । 

( 5 ) कृषि उत्पादन वृद्धि हेतु नयी तकनीक :- भारी मात्रा में रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के उपयोग से यद्यपि कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई , किन्तु इससे वायु प्रदूषण एवं भूमि प्रदूषण की गम्भीर समस्या उत्पन्न हुई । इसके लिए हरी खाद , कम्पोस्ट खाद तथा अन्य वानस्पतिक खादों अधिकतम उपयोग किया जाये और फसल चक्र परिवर्तन किया जाये । 

( 6 ) भूमि सम्मेलनों का आयोजन :-  पर्यावरण हास व प्रदूषण आज एक अंतर्राष्ट्रीय समस्या बन चुका है । इसलिए पर्यावरण की सुरक्षा के लिए भूमि सम्मेलनों के आयोजन की नितान्त आवश्यकता है । जिसमें विकसित राष्ट्र भूमि की सुरक्षा के समुचित उपाय करें । इसके लिए ' भूमि सुरक्षा कोष ' की स्थापना कर सभी देशों की सहभागिता सुनिश्चित करनी चाहिए । 

( 7 ) पर्यावरण के साथ अनावश्यक हस्तक्षेप पर रोक :-  प्रकृति से अनावश्यक छेड़छाड़ के कारण ही आज पर्यावरण असन्तुलन एवं प्रदूषण की समस्या उत्पन्न हो गयी है । मनुष्य को चाहिए कि प्रकृति के द्वारा दिये गये निःशुल्क उपहारों जैसे - वन , जल , भूमि , खनिज , वन्यजीव आदि ने अनावश्यक छेड़छाड़ बन्द कर देनी च .. वृक्षारोपण पर ध्यान दिया जाना चाहिए । 

( 8 ) राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय नीति :- राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नीतियाँ बनाकर ऐसे मानक निर्धारित कर देने चाहिए जिसके अंतर्गत रहकर ही मानव को अपने विकास कार्यों को चलाने की अनुमति हो । प्राकृतिक संसाधनों के अनियोजित उपयोग पर रोक लगाना बहुत आवश्यक है । अतः हम कह सकते हैं कि पर्यावरण में संतुलन करना आज हमारा प्राथमिक कर्तव्य है । पश्चिमी देशों के लिए पर्यावरण विकास का अर्थ वहाँ के जीवन स्तर को ऊपर उठाना हो सकता है । किन्तु भारत के लिए यह जीवन - मृत्यु का प्रश्न है । 

पर्यावरण ह्रास की रोकथाम के लिए सरकार द्वारा किये गये उपाय :- 

पर्यावरण संरक्षण के लिए केन्द्र एवं राज्य सरकारों ने अनेक कानून बनाये हैं। इनमें से कुछ प्रमुख कानून हैं- जल प्रदूषण ( निवारण और नियंत्रण ) अधिनियम 1974 , वायु प्रदूषण ( निवारण और नियंत्रण ) अधिनियम 1981 , फैक्ट्री अधिनियम , कीटनाशक अधिनियम । इन अधिनियमों के क्रियान्वयन का दायित्व केन्द्र एवं राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड , कारखानों के मुख्य निरीक्षकों और कृषि विभागों के कीटनाशक निरीक्षकों पर है । पर्यावरण संबंधी समस्याओं को दृष्टिगत रखते हुए सरकार ने सन 1972 में एक पर्यावरण समन्वय समिति का गठन किया जिसकी सिफारिश पर सन 1980 में पर्यावरण विभाग की स्थापना की गई । पर्यावरण के कार्यक्रमों के आयोजन , प्रोत्साहन और समन्वय के लिए सन 1985 में ' पर्यावरण , वन्य और वन्य जीव मन्त्रालय की स्थापना की गई है । पर्यावरण ( सुरक्षा ) अधिनियम, 19 नवंबर सन 1986 से लागू किया गया है। जिसका उद्देश्य पर्यावरण प्रदूषण के निवारण, नियंत्रण के लिए राष्ट्रव्यापी कार्यक्रम की योजना बनाकर उसे क्रियान्वित करना है।

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