प्रथम विश्व युद्ध का इतिहास

दोस्तों आज के इस Post में आप पढ़ेंगे प्रथम विश्व युद्ध का इतिहास (History of First World War) पर सरल शब्दों में एक लेख हिंदी में तो चलिए प्रारम्भ करते हैं।

First World War in Hindi text image

प्रथम विश्व युद्ध का परिचय :- 

सन 1914 में यूरोप में एक ऐसा युद्ध आरंभ हुआ जिसने पूरे विश्व को अपने प्रभाव क्षेत्र में समेट लिया । इस युद्ध से जितना विनाश हुआ उतना मानव इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था ।

1914 में आरंभ होने वाला युद्ध एक सर्व व्यापी युद्ध था जिसमें युद्धरत् देशों ने अपने सारे संसाधन झोंक दिए । इसका पूरी दुनियाँ की अर्थ व्यवस्था पर प्रभाव पड़ा इस युद्ध में असैनिक क्षेत्रों पर हुई बमबारियों से तथा युद्ध के कारण फैले अकाल और महामारियों से जितनी आम लोगों की जाने गई उनकी संख्या मारे गये सैनिकों से कहीं अधिक थी ।
इस युद्ध का प्रभाव भी अभूतपूर्व था । इसने दुनिया के इतिहास को एक नया मोड़ दिया । इस युद्ध में लड़ाइयाँ यूरोप , एशिया , अफ्रीका और प्रशान्त क्षेत्र में लड़ी गई । इसके अभूतपूर्व फैलाव और इसकी सर्वागिक प्रकृति के कारण इसे विश्व युद्ध ' कहा जाता है । चूंकि ऐसे दो महायुद्ध हुए । अतः इन्हें क्रमशः प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध कहते हैं ।

प्रथम विश्व युद्ध के कारण :- 

प्रथम विश्व युद्ध के निम्न कारण थे जिसके वजह से यह युद्ध आरम्भ हुआ। 

( 1 ) साम्राज्यवादी शक्तियों में आपसी कलह :-

 युद्ध का मूल कारण थीं साम्राज्यवादी देशों की आपसी प्रतिस्पर्धाएं और टकराव । एशिया और अफ्रीका की साम्राज्यवादी विजय के दौरान साम्राज्यवादी देशों में टकराव होता रहता था । कभी - कभी साम्राज्यवादी देश आपस में " शान्तिपूर्ण निपटारा " कर लेते थे और एक - दूसरे के खिलाफ बल - प्रयोग किये बिना एशिया या अफ्रीका के किसी भाग को आपस में बांट लेते थे । कई बार आपसी टकराव के कारण युद्ध की परिस्थितियाँ भी पैदा हो जाती थी ।
 19 वीं सदी के अंत तक स्थिति बदल चुकी थी । एशिया और अफ्रीका के अधिकांश भागों को साम्राज्यवादी देश आपस में बाँट चुके थे और आगे विजय का एक ही रास्ता था कि किसी साम्राज्यवादी देश से उसके उपनिवेश छीने जाए । इस लिए 19 वी सदी के अन्तिम दशक के बाद के दौर में साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धाओं के कारण विश्व को पुनर्विभाजित करने के प्रयास होने लगे जिससे युद्ध की परिस्थितियाँ पैदा हुई ।

( 2 ) उपनिवेश के लिए संघर्ष :-

 जर्मनी के एकीकरण के बाद उसका बहुत अधिक आर्थिक विकास हुआ था । 1914 के आते आते तक वह लोहे और इस्पात तथा बहुत सी औद्योगिक वस्तुओं के उत्पादन में ब्रिटेन और फ्रांस को बहुत पीछे छोड़ चुका था । जर्मनी उपनिवेशों की दौड़ में बहुत बाद में शामिल हुआ था और इसलिए उसे कम उपनिवेश हाथ लगे थे । जर्मन साम्राज्यवादियों ने पूर्व में पाँव फैलाने की सोची । उसकी महत्वाकांक्षा थी पतनशील उस्मानिया ( तुर्की ) साम्राज्य की अर्थ व्यवस्था पर अपना नियंत्रण स्थापित करना । इसके लिए उसने बर्लिन से बगदाद तक एक रेल लाईन बिछाने की योजना बनाई । इस योजना से ब्रिटेन , फ्रांस और रूस डर गए , क्योंकि इस रेल लाईन के तैयार होने पर उस्मानिया साम्राज्य से संबंधित उनकी साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं को धक्का लगता ।

जर्मनी की तरह यूरोप की सभी प्रमुख शक्तियों और जापान की भी अपनी - अपनी साम्राज्यवादी महत्वकांक्षाएं थीं । इटली जो एकीकरण के बाद फ्रांस जितना ही शक्तिशाली बन चुका था , उत्तरी अफ्रीका स्थित त्रिपोली पर नजरें गड़ाए था जो उस्मानिया साम्राज्य का क्षेत्र था । फ्रांस अफ्रीका में अपने साम्राज्य में मोरक्को को भी शामिल करना चाहता था । रूस की ईरान , कुस्तुतुनिया समेत उस्मानिया साम्राज्य के इलाकों , सुदूर पूर्व और अन्य जगहों से सम्बंधित अपनी महत्वाकांक्षाएं थीं ।

रूस की महत्वाकांक्षाओं का ब्रिटेन , जर्मनी और आस्ट्रिया के हितों और महत्वाकांक्षाओं से टकराव हुआ । जापान भी तब तक एक साम्राज्यवादी देश बन चुका था ।
सुदूर पूर्व में उसकी अपनी महत्वाकाक्षाएं थी और वह इन्हें पूरा करने के लिए कदम भी उठा चुका था । ब्रिटेन के साथ एक समझौता करने के बाद उसने 1904-1905 में रूस को हराया और सुदूर पूर्व में उसका प्रभाव बढ़ गया । ब्रिटेन का दूसरे सभी साम्राज्यवादी देशों से टकराव हो गया था , क्योंकि उसके पास पहले से एक बहुत बड़ा साम्राज्य था और उसकी रक्षा करना आवश्यक था ।

जब कभी किसी देश की शक्ति बढ़ती थी उसे ब्रिटिश साम्राज्य के लिए खतरा समझा जाता था । उसका अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार भी बहुत फैला हुआ था और इस व्यापार की रक्षा उसे प्रतियोगी देशों से करनी पड़ती थी । साथ ही उसे अपने साम्राज्य के व्यापार मार्गों की रक्षा भी करनी थी । उस्मानिया साम्राज्य के बारे में आस्ट्रिया की भी महत्वाकांक्षाएँ थी ।

संयुक्त राज्य अमरीका भी 19 वी सदी के अन्त तक एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में उभर चुका था । उसने फिलीपाइन को हड़प लिया था । चूंकि उसका व्यापार बहुत तेजी से बढ़ रहा था इसलिए उसकी मुख्य दिलचस्पी व्यापार की स्वतंत्रता बनाए रखने में थी । दूसरी बड़ी ताकतों के प्रभाव का बढ़ना अमरीकी हितों के लिए खतरा समझा जाता था ।

( 3 ) यूरोप में संघर्ष :-

 यूरोप की प्रमुख शक्तियों के बीच उपनिवेशों और व्यापार को लेकर टकराव तो थे ही , साथ ही यूरोप के अंदर होने वाली कुछेक घटनाओं को लेकर भी टकराव थे । उस समय यूरोप में छह प्रमुख शक्तियाँ थी- ब्रिटेन , जर्मनी, ऑस्ट्रिया , हंगरी , रूस , फ्रांस और इटली । एक प्रश्न जिसमें ये सभी देश उलझ गए , वह था - यूरोप के बाल्कन प्रायद्वीप के देशों का प्रश्न । बाल्कन प्रायद्वीप के देश उस्मानिया साम्राज्य के अधीन थे । मगर 19 वीं सदी में उस्मानिया साम्राज्य का पतन आरम्भ हो चुका था ।

स्वाधीनता के लिए अनेक जातियाँ इस साम्राज्य के विरूद्ध विद्रोह कर रही थीं । रूस के जारों को आशा थी कि इन क्षेत्रों से उस्मानी तुर्की का शासन समाप्त होने के बाद ये रूस नियंत्रण में आ जाएँगे । उन्होंने सर्व स्लाव नामक एक आंदोलन को बढ़ावा दिया जो इस सिद्धान्त पर आधारित था कि पूर्वी यूरोप के सभी स्लाव एक जनगण के लोग हैं । स्लाव आस्ट्रिया हंगरी के अनेक क्षेत्रों में भी रहते थे । इसलिए रूस ने उस्मानिया साम्राज्य और आस्ट्रिया - हंगरी दोनों के खिलाफ आन्दोलन को बढ़ावा दिया ।

उस्मानिया साम्राज्य और आस्ट्रिया स्लाव बहुल क्षेत्रों को एक करने के आन्दोलन का नेतृत्व बल्कान प्रायद्वीप का एक प्रमुख देश सर्बिया कर रहा था । रूस के बढ़ते प्रभाव को देखकर यूरोप की दूसरी प्रमुख शक्तियाँ चौकन्नी हो गई । वे रूस के प्रभाव को बढ़ने से रोकना चाहती थी । जबकि आस्ट्रिया - हंगरी इस क्षेत्र में अपना पाँव फैलाना चाहता था । सर्व - स्लाव आन्दोलन की तरह एक सर्व - जर्मनी - आन्दोलन भी चला जिसका उद्देश्य जर्मनी के प्रभाव को पूरे मध्य यूरोप और बल्कान क्षेत्र में फैलाना था ।

इटली ने कुछ ऐसे क्षेत्रों पर दावा किया जो उस समय आस्ट्रिया के अधीन थे । फ्रांस ने केवल अपने अल्सास लारेन प्रांतों को वापस पाना चाहता था जो उसे 1871 में जर्मनी को देने पड़े थे , इसके अलावा जर्मनी के साथ 1870-71 के युद्ध में उसकी जो शर्मनाक हार हुई थी वह जर्मनी से उसका बदला भी लेना चाहता था ।

( 4 ) गुटों का निर्माण :-

 यूरोप में उपनिवेशों को लेकर होने वाले जिन टकरावों का वर्णन किया जा चुका है , उनके कारण 19 वी सदी के अंतिम दशक और उसके बाद के काल में यूरोप में तनाव की स्थिति पैदा हो गई । यूरोप के देश अब परस्पर विरोधी गुटों में शामिल होने लगे । अपनी सैनिक शक्ति बढ़ाने , अपनी सेनाओं और नौ सेनाओं की संख्या बढ़ाने , नए और पहले से अधिक धातक हथियार विकसित करने तथा आमतौर पर युद्ध की तैयारियाँ करने पर वे अपार धन खर्च करने लगे ।

 यूरोप अब धीरे - धीरे विशाल सैनिक शिविर बनता जा रहा था । 20 वी सदी के पहले दशक में इन देशों के दो परस्पर विरोधी गुट बन गए और वे अपनी - अपनी सैनिक शक्ति के साथ एक दूसरे के मुकाबले के लिए तैयार हो गए । 1882 में एक त्रिगुट ( ट्रिपल एलायंस ) बना था जिसमें जर्मनी , आस्ट्रिया हंगरी और इटली शामिल थे । मगर इस गुट के प्रति इटली की वफादारी संदिग्ध थी क्योंकि उसका मुख्य उद्देश्य यूरोप में आस्ट्रिया हंगरी से कुछ इलाके छीनना और फ्रांस की सहायता से त्रिपोली को जीतना था ।

 इस त्रिगुट के विरोध में फ्रांस , रूस और ब्रिटेन ने 1907 में एक त्रिदेशीय संधि ( ट्रिपल एन्तेंत ) बनाई । जैसा कि शब्द " एन्ता " ( इसका शाब्दिक अर्थ है- आपसी समझदारी ) से स्पष्ट है , यह सन्धि सिद्धान्त रूप से आपसी समझ पर आधारित एक ढीला - ढाला गठजोड़ थी । इन दो परस्पर विरोधी गुटों के उदय से यह निश्चित हो गया था कि अगर इनमें से कोई भी देश किसी टकराव में उलझता है। तो वह टकराव एक अखिल यूरोपीय युद्ध में बदल जायेगा ।

युद्ध में ठीक पहले के वर्षों में एक के बाद एक संकट आए । इन संकटों के कारण यूरोप में तनाव और कड़वाहट में वृद्धि हुई और राष्ट्रीय श्रेष्ठतावाद का जन्म हुआ । यूरोपीय देश दूसरों के इलाके पाने के लिए आपस में गुप्त समझौते भी करने लगे । इन समझौतों का अक्सर ही भंडाफोड़ जाता था और इससे इनको लेकर हर देश में भय और शंका का वातावरण और भी तीखा हो जाता था । ऐसे भय और शंकाओं के कारण युद्ध की घड़ी और भी पास आ गई ।

युद्ध का आरंभ ( तात्कालिक कारण ) :-

युद्ध का आरंभ एक मामूली धटना से हुआ । अगर यूरोप वर्षों से युद्ध की तैयारी कर रहे दो परस्पर विरोधी सैनिक शिविरों में न बँटा होता तो इस घटना से कोई खास तहलका नहीं मचता । 28 जून 1914 को आर्कड्यूक फ्रांसिस फर्डीनांड की बोस्निया की राजधानी में हत्या हो गयी । ( स्मरणीय है कि कुछ ही वर्ष पहले आस्ट्रिया ने बोस्निया को हड़प लिया था ) फर्डीनांड आस्ट्रिया हंगरी की गद्दी का उत्तराधिकारी था ।

 आस्ट्रिया ने इस हत्या में सर्बिया का हाथ देखा और उसे चेतावनी दी । सर्बिया ने इस चेतावनी की एक मांग मानने से इंकार कर दिया क्योंकि वह उसकी पूर्ण स्वतंत्रता के विरूद्ध थी । 28 जुलाई 1914 को ऑस्ट्रिया ने सर्बिया के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी । रूस ने सर्बिया को पूर्ण सहायता का वादा किया था और इस लिए यह भी युद्ध की तैयारी करने लगा ।

जर्मनी ने 01 अगस्त को रूस और 3 अगस्त को फ्रांस के विरूद्ध युद्ध की घोषणा की । फ्रांस पर दबाव डालने के लिए जर्मन सेनाएं 4 अगस्त को बेल्जियम में घुस उसी दिन ब्रिटेन ने जर्मनी के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी । अनेक दूसरे देश भी लड़ाई में शामिल हो गये सुदूर - पूर्व में जर्मनी के उपनिवेश हथियाने के उद्देश्य से जापान ने जर्मनी के विरूद्ध युद्ध की घोषणा कर दी ।

 तुर्की और बुल्गारिया जर्मनी की तरफ हो गए । त्रिगुट का सदस्य होने के बावजूद इटली कुछ समय तक तटस्थ बना रहा । 1915 ई . में वह जर्मनी और आस्ट्रिया तथा हंगरी के विरूद्ध युद्ध में गईं । शामिल हुआ ।

प्रथम विश्व युद्ध की प्रमुख घटनाएँ :-

1. युद्ध का आरंभ :- 

जर्मनी को आशा थी कि वह बेल्जियम पर बिजली की तरह मार करके वह फ्रांस पर हमला कर देगा और उसे कुछ ही हफ्तों में हरा देगा और तब वह रूस से उलझेगा । कुछ समय तक ऐसा लगा कि यह योजना सफल हो रही है । जर्मन सेना पेरिस से मात्र 20 किलो मीटर की दूरी तक आ पहुँची । रूस ने जर्मनी और आस्ट्रिया पर हमले आरंभ कर दिये थे इसलिए कुछ जर्मन सेना पूर्वी मोर्चे पर भी भेजनी पड़ी ।

जल्द ही फ्रांस की तरफ सेनाओं का बढ़ना रूक गया और यूरोप में युद्ध में लम्बे समय के लिए गतिरोध पैदा हो गया । इस बीच युद्ध दुनिया के कई दूसरे भागों तक फैल गया और पश्चिमी एशिया अफ्रीका और सुदूर पूर्व में भी लड़ाइयाँ होने लगीं । जर्मन सेनाओं का बढ़ना रूक जाने के बाद एक नए प्रकार का युद्ध आरंभ हो गया । परस्पर भिड़ रही सेनाएं खंदकें खोदकर , वहाँ से एक दूसरे पर छापे मारने लगीं ।

पूर्वी मोर्चे पर आस्ट्रिया को रूस के हमले असफल बनाने और रूसी साम्राज्य के कुछ भागों पर कब्जा करने में सफलता मिली यूरोप से बाहर फिलिस्तीन , मोसोपोटामिया और अरब में उस्मानिया साम्राज्य और जर्मनी तथा तुर्की के विरूद्ध अभियान संगठित किए गए । जर्मनी तथा तुर्की के विरूद्ध भी अभियान संगठित किये गये । जो ईरान में अपना प्रभाव स्थापित करना चाहते थे । पूर्वी एशिया में जापान ने जर्मनी के अधिकार क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया और अफ्रीका में ब्रिटेन तथा फ्रांस ने अधिकांश जर्मन उपनिवेश हथिया लिए ।

2. युद्ध में नए एवं भयंकर हथियारों का प्रयोग :-

इस युद्ध में अनेक नए हथियारों का उपयोग किया गया । इस तरह के दो हथियार थे मशीनगन और तरल अग्नि ( लिक्विड फायर ) । युद्ध में पहली बार आम जनता को मारने के लिए हवाई जहाजों का उपयोग किया गया । अंग्रेजों ने टैंकों का प्रयोग किया जो आगे चलकर युद्ध के प्रमुख हथियार बन गए । दोनों युद्धरत गुटों ने एक - दूसरे तक खाद्यान्न , कारखानों के कच्चे माल तथा हथियारों को पहुंचने से रोकने की कोशिश की ।

इस काम में समुद्री युद्ध की प्रमुख भूमिका रही । जर्मनी ने बड़े पैमाने पर यू – बोट नामक पनडुब्बियों का उपयोग किया । इसका उद्देश्य दुश्मन के जहाजों को ही नहीं , बल्कि ब्रिटिश बंदरगाहों की ओर बढ़ रही तटस्थ नौकाओं को भी नष्ट करना था । इस युद्ध में जहरीली गैसों का भी उपयोग किया गया । जो एक और भयानक हथियार था । युद्ध लम्बा खिंच गया और इससे लाखों की जानें गयीं और अरबों की धन व सम्पत्ति नष्ट हुई ।

3. संयुक्त राज्य अमेरिका युद्ध में शामिल :-

6 अप्रैल 1917 को संयुक्त राज्य अमेरिका ने जर्मनी के विरूद्ध युद्ध की घोषणा की । अमेरिका एन्ता देशों के लिए हथियारों और दूसरी आवश्यक वस्तुओं का प्रमुख स्त्रोत बन चुका था । 1915 ई . जर्मनी की यू - बोट ने ' लुसितानिया ' नामक एक ब्रिटिश जहाज को डुबो दिया था । मरने वाले 1153 यात्रियों में 128 अमेरिकी भी थे । इस घटना के बाद अमेरिका में जर्मन विरोधी भावनाएं भड़क उठी और अमेरिका भी युद्ध में शामिल . हो गया ।

रूस का युद्ध से अलग होना :-

1917 की एक और प्रमुख घटना थी अक्टूबर क्रान्ति और उसके बाद रूस का युद्ध से हट जाना । रूसी क्रान्तिकारी आरंभ से ही युद्ध का विरोध करते आए थे । लेनिन के नेतृत्व में उन्होंने फैसला किया था कि वे रूसी निरंकुश शासन को उखाड़ फेककर सत्ता पर कब्जा करने के लिए इस युद्ध को एक क्रान्तिकारी युद्ध में बदल देंगे । युद्ध में रूसी साम्राज्य को भारी नुकसान उठाना पड़ा था ।

रूस के छह लाख से अधिक सैनिक मारे जा चुके थे । जिस दिन बोलशेविक सरकार सत्ता में आयी उसके दूसरे दिन उसने शान्ति जारी कि जिसमें दूसरे के क्षेत्रों को लिए बिना और युद्ध के हरजाने के लिए शान्ति स्थापित करने के प्रस्ताव रखे थे । रूस ने युद्ध से हट जाने का फैसला किया और मार्च 1918 में जर्मनी के साथ एक शान्ति संधि की ।

युद्ध की समाप्ति :-

युद्ध को समाप्त कराने के लिए अनेक प्रयास किए गए । अमेरिका के राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने जनवरी 1918 में शान्ति का एक कार्यक्रम सामने रखा । यह राष्ट्रपति विल्सन के " चौदह सूत्रों के नाम से विख्यात हुआ । जिसका विवरण निम्नलिखित है :
  •  गुप्त संधियों का परित्याग । 
  •  सभी देशों का सभी समुद्री मार्गों का स्वतंत्र रूप से प्रयोग करना । 
  •  राष्ट्रों के मध्य खुलेतौर पर बातचीत हो और संधियाँ की जाए ।
  •  हथियारों के निर्माण में कटौती हो । 
  •  जर्मनी बेल्जियम से हट जाए ।
  •  फ्रांस को आल्सेस और लारेन के प्रांत वापस लौटा दिए जाए । 
  •  यूरोप में राष्ट्रीयता के आधार पर कुछ नये देशों का निर्माण किया जाए । 
  •  अंतर्राष्ट्रीय शान्ति के लिए राष्ट्र संघ की स्थापना की जाए । 
  •  उपनिवेशों के दावों को पुनः निष्पक्ष रूप से तय किया जाए । 
  •  हारे हुए राष्ट्रों से हरजाने के रूप में धनराशि ली जाए । 
  •  जर्मनी और फ्रांस के बीच लगने वाले राइन नदी के क्षेत्र को पूरी तरह सेना रहित कर दिया जाए । 
  •  दोषी राष्ट्रों की सैनिक संख्या तय कर दी जाए । 
  •  सार नामक कोयले का क्षेत्र फ्रांस को दे दिया जाए । 
  •  बेल्जियम को स्वतंत्र कर दिया जाए ।
विल्सन का चौदह सूत्री कार्यक्रम शांति व्यवस्था बहाल करने के लिये लागू किया गया पर इसमें निम्न कमियाँ थीं
  • अस्त्र शस्त्रों में कटौती के नियम को समानता से लागू नहीं किया गया । हारने वाले देशों- जर्मनी , आस्ट्रिया - हंगरी तथा टर्की आदि की सैन्य शक्ति कम कर दी गयी । लेकिन विजेता देशों पर कोई अंकुश नहीं लगाया गया ।
  •  संधि की शर्ते पराजित और विजित राष्ट्रों की आपसी बातचीत का परिणाम न थी । यह शर्ते तो विजित राष्ट्रों द्वारा पराजित राष्ट्रों पर बलपूर्वक थोपी गयी थीं ।

प्रथम विश्व युद्ध के परिणाम :-

प्रथम विश्व युद्ध उस समय तक विश्व में हुए सभी युद्धों से अधिक भयावह था । इसके परिणाम केवल यूरोप को ही प्रभावित करने वाले नहीं थे , वरन सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित करने वाले थे । इस युद्ध के परिणाम निम्नलिखित है ।

( 1 ) अपार धनजन की हानि : -

इस युद्ध में लड़ने वालों की संख्या विस्मयकारी थी । विभिन्न अनुमानों के अनुसार 45 करोड़ से भी अधिक लोग इस युद्ध से प्रभावित लड़ाई में मारे गए एवं घायलों की संख्या भी करोड़ों में थी इसमें लाखों भारतीय सैनिकों ने भाग लिया । हवाई हमलों , अकालों और महामारियों से भारी संख्या में असैनिक लोग मारे गए । दोनों पक्षों का भारी धन सम्पत्ति का विनाश हुआ ।

( 2 ) राजनीतिक परिणाम : -

 इस युद्ध तथा इसके बाद की शान्ति सन्धियों ने दुनियाँ हुए। का और मुख्यतः यूरोप का नक्शा ही बदल कर ख दिया । इस युद्ध के पश्चात् यूरोप में निम्लेखित राजनीतिक परिवर्तन हुए :
  • यूरोप के निरंकुश राजतंत्रों का अन्त हो गया । 
  • गणतंत्रों का उदय । 
  • राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीयता की भावना का तेजी से प्रसार हुआ । 
  • नवीन गणतन्त्रों की प्रवृत्ति अधिनायक वादी हो गई । 
  • राष्ट्र संघ की स्थापना ।
  • रूस में साम्यवादी सिद्धान्तों के र पर नयी शासन व्यवस्था की स्थापना ।

( 3 ) सामाजिक परिणाम :-

  • स्त्रियों की स्थिति में सुधार हुआ । 
  • सामाजिक असमानता का अन्त हो गया और विश्व में भ्रातृत्व की भावना का विकास हुआ ।

( 4 ) धर्म के प्रति आस्था का कम होना : - 

जनता धर्म को राजनीति से पृथक समझने लगी । ईश्वरीय सत्ता की उपेक्षा भी की जाने लगी ।

( 5 ) विज्ञान की प्रगति : - 

वैज्ञानिकों ने अनेक उपयोगी आविष्कार किए लेकिन उग्र राष्ट्रवाद के कारण विनाशकारी एवं विध्वंसकारी अस्त्र शस्त्रों का निर्माण किया गया ।

( 6 ) सांस्कृतिक परिणाम : -

 राष्ट्रों की ऐतिहासिक कला - कृतियों , स्मारकों , भवनों , नगरों का विनाश हो गया । युद्ध के पश्चात् अन्तर्राष्ट्रीय संस्कृति को प्रोत्साहन मिला ।

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( 7 ) भावी युद्ध के बीज :- 

ऐसी धारणा थी कि प्रथम विश्वयुद्ध के बाद अब कोई इतना विध्वंसक युद्ध शान्ति सन्धियाँ युद्ध के लिए समाप्त करने में असमर्थ रहीं । संधियों की कुछ व्यवस्थाएं पराजित देशों की दृष्टि से अत्यंत कठोर थीं । उन्होंने भावी संघर्षों के बीज बोये ।

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